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वृन्दावन तो वृंदावन है,

प्रेम-राग की रजधानी


प्रेम यहाँ बसता राधा में

मुरली मधुर मुरारी में

प्रेम यहाँ अधरों की भाषा

नयनों की लयकारी में  


प्रेम यहाँ रस-धार रसीली,

मीठा यमुना का पानी


प्रेम यहाँ पर माखन-मिश्री

दूध-दही, फल-मेवा में

प्रेम यहाँ पर भोग कृष्ण का

भक्ति-भाव नित सेवा में


प्रेम यहाँ पर ब्रज-रज-चंदन,

शीतल-संतों की वाणी


प्रेम यहाँ तुलसी की माला

नाम, जाप, तप, मोती में

प्रेम यहाँ मंदिर की घण्टी,

जगमग-जगमग जोती में


प्रेम यहाँ पर ध्यान-साधना,

मुक्ति-प्रदाता, वरदानी।

अवनीश सिंह चौहान

बाह्य सूत्र

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