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१३० लेख हिंदी में

संत

Soordas 2
हिंदी साहित्य में कृष्ण-भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में महाकवि सूरदास का नाम अग्रणी है। उनका जन्म 1478 ईस्वी में मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में 1580 ईस्वी में हुई।

विस्तार में... सूरदास

प्रवचन

Osho
तुम जहाँ हो, वहीं से यात्रा शुरू करनी पड़ेगी। अब तुम बैठे मूलाधार में और सहस्रार की कल्पना करोगे, तो सब झूठ हो जाएगा। फिर इसमें दुखी होने का भी कारण नहीं, क्योंकि जो जहाँ है, वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है। इसमें चिंतित भी मत हो जाना कि अरे, दूसरे मुझसे आगे हैं, और मैं पीछे हूँ! दूसरों से तुलना में भी मत पड़ना! नहीं तो और दुखी हो जाओगे। सदा अपनी स्‍थिति को समझो। और अपनी स्‍थिति के विपरीत स्‍थिति को पाने की आकांक्षा मत करो। अपनी स्‍थिति से राजी हो जाओ। तुमसे मैं कहना चाहता हूँ। तुम अपनी नीरसता से राजी हो जाओ। तुम इससे बाहर निकलने की चेष्टा ही छोड़ो। तुम इसमें आसन जमाकर बैठ जाओ। तुम कहो- मैं नीरस हूँ। तो मेरे भीतर फूल नहीं खिलेंगे, नहीं खिलेंगे, तो मेरे भीतर मरुस्थल होगा, मरुद्यान नहीं होगा, नहीं होगा।

विस्तार में... जीवन को उत्सव बना लो

दर्शन

Guruji
गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं– 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।' यह बात कई बार हमारे लोक-व्यवहार में सुनने-सुनाने को मिल जाती है। तात्पर्य यह कि शिष्य की अपने गुरु में आस्था इतनी गहरी हो, विश्वास इतना प्रबल हो कि वह उसे मनुष्यरूप में साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर माने। 'मानना' एक साधना है! 'न मानना' भी एक साधना है! किन्तु, दोनों में अन्तर भी है, वैसा ही अन्तर जैसा एक आस्तिक और नास्तिक में होता है।

विस्तार में... गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं

लेख

Mother-0
'मातृ देवो भव:' कहकर उपनिषदों ने माँ को सर्वोपरि बतलाया, जबकि मनुस्मृति में माँ को पिता से सौ गुना बड़ा बतलाया गया है। रामचरित मानस में बाबा तुलसीदास कौशल्या माँ के श्रीमुख से कहलवाते हैं— "जौ केवल पितु आयषु ताता।/तौ जनि जाहु जानि बडि माता।।" यानी वन गमन की आज्ञा यदि केवल पिता ने दी हो तो मत जाओ। पिता से माता का स्थान बड़ा होता है।संसार में माँ की समता और किसी से नहीं हो सकती। माता अपने सुखों का त्यागकर दूसरों को सुख देने का पुनीत भाव मन में रखती है। उसका ह्रदय दया, करुणा एवं प्रेम का सागर होता है। प्रथम गुरु माता ही होती है।

विस्तार में... मातृ देवो भव:

तीर्थ  

Vrindavan
वृन्दावन, जोकि मथुरा से 15 किमी की दूरी पर है, ब्रज क्षेत्र का एक प्राचीन तीर्थ स्थल है। यह तीर्थ स्थल भगवान श्रीकृष्ण की लीला-स्थली रहा है। यहाँ पर श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी के अनेकों सुन्दर मन्दिर हैं— विशेषकर श्री बांकेविहारी जी का मंदिर, राधावल्लभलाल जी का मंदिर, श्री राधारमण, श्री राधा दामोदर, निधिवन, सेवाकुञ्ज, श्री गोपेश्वर महादेव, श्री कृष्ण-बलराम मन्दिर, पागलबाबा का मंदिर, रंगनाथ जी का मंदिर, प्रेम मंदिर, श्री कृष्ण प्रणामी मन्दिर, वैष्णो माता मंदिर, चामुण्डा मंदिर आदि।

विस्तार में... वृन्दावन

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