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'मातृ देवो भव:' कहकर उपनिषदों ने माँ को सर्वोपरि बतलाया, जबकि मनुस्मृति में माँ को पिता से सौ गुना बड़ा बतलाया गया है। रामचरित मानस में बाबा तुलसीदास कौशल्या माँ के श्रीमुख से कहलवाते हैं— ''"जौ केवल पितु आयषु ताता।/तौ जनि जाहु जानि बडि माता।।" यानी वन गमन की आज्ञा यदि केवल पिता ने दी हो तो मत जाओ। पिता से माता का स्थान बड़ा होता है।

माता दया की मूर्ति, करुणा का सागर होती है। सीता माता से लंका विजय के बाद हनुमान ने पूछा कि यदि माता आपकी आज्ञा हो तो इन राक्षसियों को मैं मार डालूँ, क्योंकि इन्होंने आपको बहुत कष्ट दिए हैं। तब जानकी माँ ने कहा था— "बेटा, इन राक्षसियों को नहीं मारना, मेरे ही कर्म ने मुझे कष्ट दिए हैं।" इसीप्रकार महाभारत में प्रसंग है कि द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए रात्रि में जब अश्वत्थामा ने मार डाला, तब अर्जुन अश्वत्थामा से युद्ध कर उसे बंदी बनाकर द्रौपदी के समक्ष ले आये। अश्वत्थामा को देख भीम से न रहा गया। वह उसे मारने दौड़ पड़े। द्रौपदी ने भीम को कहा— "इन्हें मत मारो। छोड़ दो। इनकी माता को बहुत दुःख होगा।" भीम द्रौपदी की बात को अनसुनाकर अश्वत्थामा को मारने के लिए दौड़ पड़े, उधर दयावश द्रौपदी भी उसे बचाने के लिए दौड़ पडीं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को पकड़कर अश्वत्थामा की रक्षा की।

संसार में माँ की समता और किसी से नहीं हो सकती। माता अपने सुखों का त्यागकर दूसरों को सुख देने का पुनीत भाव मन में रखती है। उसका ह्रदय दया, करुणा एवं प्रेम का सागर होता है। प्रथम गुरु माता ही होती है। माता मदालसा ने अपने चार पुत्रों को बाल्यकाल में ज्ञान का उपदेश देकर जगत कल्याण के लिए योगी बना दिया। माता शकुन्तला ने भी अपने पाँच वर्ष के पुत्र भरत को वीरता का उपदेश दिया था।

भगवान वेदव्यास, महर्षि बाल्मीकि, बाबा तुलसीदास, महाकवि कालीदास से लेकर आज तक के तमाम साहित्यकारों द्वारा माँ की प्रतिष्ठा में अनेकों रचनाएँ लिखीं और गायी गयी हैं, तथापि ऐसा लगता है कि माँ की महिमा का पूर्ण वर्णन कर पाना बहुत कठिन है।

इधर लगभग एक सौ दस वर्ष  (सन 1908) पहले वर्जीनिया की ए जर्विस की पहल से अमेरिका में 'मदर्स डे' मनाये जाने की शुरुवात हुई। अमेरिका में इस दिन अवकाश रहता है और इसे 'मदर्स डे' के नाम से ही जाना जाता है। 'यूनानी संस्कृति' में इसे 'सिबिली', रोम में 'हिलारिआ', ईसाई धर्म में 'मदरिंग सनडे' और भारत में 'मातृ दिनम' (संस्कृत) कहा जाता है। भारतीय समाज में वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की पूजा एवं नवरात्र में मातृ पूजा कर माँ को श्रद्धासुमन अर्पित किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है, तथापि आधुनिक पद्धति के अनुसार मई माह के दूसरे रविवार को भारत में 'मदर्स डे' मनाया जाने लगा है। मातृ शक्ति को प्रणाम करते हुए वीरेंद्र आस्तिक जी के शब्दों में हम इतना ही कहना चाहेंगे— "माँ तिहारी ज़िन्दगी का/गीत गा पाया नहीं।"

माँ

घर की दुनिया माँ होती है

खुशियों की क्रीम परसने को

दुःखों का दही बिलोती है


पूरे अनुभव एक तरफ हैं

मइया के अनुभव के आगे

जब भी उसके पास गए हम

लगा अँधेरे में हम जागे


अपने मन की परती भू पर

शबनम आशा की बोती है


उसके हाथ का रूखा-सूखा-

भी हो जाता है काजू-सा

कम शब्दों में खुल जाती वह

ज्यों संस्कृति की हो मंजूषा


हाथ पिता का खाली हो तो

छिपी पोटली का मोती है

अवनीश सिंह चौहान

बाह्य सूत्र

  • 'साहित्य समीर दस्तक' पत्रिका (भोपाल) का माँ पर केंद्रित विशेषांक (फरवरी 2014) के अतिथि सम्पादक के रूप में सम्पादकीय।
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